Showing posts with label poem. Show all posts
Showing posts with label poem. Show all posts
Monday, 29 May 2017
Wednesday, 17 May 2017
खोया हुआ खिलौना और टूटी हुई पेंसिल
छत पर बिछी जब दरी होती थी,
चाँद के पार एक परी होती थी,
ग़मो की गठरी का बस इतना था बोझ,
एक खोया हुआ खिलौना और टूटी हुई पेंसिल होती थी,
कट्टी और सॉरी का सिलसिला होता हर रोज़,
रिश्तों के सौदे कि गुफ़्तगू इतनी सस्ती होती थी,
प्रतिस्पर्धा यूँ शुरू और ख़त्म होती थी,
जब कागज़ की नाव से रेस दोस्तों संग होती थी,
खाली थे हाथ फिर भी ऊँची उड़ान होती थी,
जेब में भरी एक रंगीन तितली होती थी,
कितनी सरल वो ज़िंदगी होती थी,
टूटी गुल्लक से पायी जब चंद सिक्कों कि अमीरी होती थी,
गर्मी कि छुट्टियों में होता शाम का इंतज़ार,
बर्फ़ के लड्डू कि मिठास ऐसी मोहक होती थी,
क्लास में पूछती जब टीचर क्या बनना है,
पायलट और हीरो कहते हुए चहरे पर चमक होती थी,
ऊंची लगती जब मंदिर की घंटी थी,
बड़े होने की बड़ी जल्दी होती थी,
कैसे लौट आयें वो लड़कपन के दिन,
जब सुबह के बाद रात नहीं शामें भी होती थी |
Sunday, 14 May 2017
क्या तोहफ़ा दूँ तुम्हें माँ
वो ख़फा़ हो फिर भी दुलार देती है,
माँ जुदा हो फिर भी प्यार देती है,
हमारी हर भूल को भूला देती है,
वो माँ ही है जो हमें रोज़ दुआ देती है |
माँ वो है जिसने हमें जीवन दिया है और जिसने अपना जीवन हमें दे दिया है | बहुत विचार किया परन्तु इसके समक्ष कोई भी उपहार तुच्छ प्रतीत हुआ | इसलिए कुछ शब्द ही पिरो दिए इस कविता के रूप में |
क्या उपहार दूँ तुम्हें मैं,
तुमने जीवन दान दिया हैं माँ।
मुस्कान होठों पर सदा सजाये,
तुमने हर बलिदान दिया है माँ।
तुलना कैसे करूँ तुम्हारी,
तुमसा कहाँ है कोई माँ।
चाहे तुम हो रूठी हमसे,
चिंता फिर भी करती माँ।
कहा जगत ने जपो हरि भजन,
मैंने केवल कह दिया "माँ"।
क्या उपहार दूँ समझ ना आये,
शत-शत नमन है तुमको माँ।
Monday, 17 April 2017
Monday, 10 April 2017
मैंने खुशियां ख़रीद ली
शहर की जगमग छोड़ कर मैंने उगते सूरज की रोशनी ख़रीद ली,
सिनेमा का विकर्षण छोड़ कर मैने किताब के पन्नो की खुशबू ख़रीद ली |
अपेक्षा का आसमान छोड़ कर मैंने प्रतीक्षा की ज़मीं ख़रीद ली,
बचपन का दामन छोड़ कर मैंने बचपने की अदाएं समेट ली।
रुई का गद्दा त्याग कर मैंने मां की गोद सहज ली,
दिन की दौड़ धूप त्याग कर मैंने सांझ की छांव सहज ली |
कोलाहल की ध्वनि नकार कर मैंने एक ग़ज़ल ख़रीद ली,
मोबाइल पर दौड़ती अंगुलियों को विराम कर मैंने वक़्त की घड़ियां ख़रीद ली।
सुविधाओं की अनंतता का बोध कर मैंने सुकून की दो रोटियां ख़रीद ली।
ख्वाहिशों को थोड़ा कम किया मैंने और खुशियां ख़रीद ली।
Wednesday, 4 January 2017
नज़र

नज़र नज़र में नज़रिया बदल जाता है,
एक नज़र में जीने का जरिया बदल जाता है |
- Random Thought by me
Sunday, 11 December 2016
A Poetic Endeavor : Seasons of Heart

Fading sunshine and waning moon,
Subtle is the warmth of winter bloom,
O night! Thee fade slowly.
Heart shells the pain out,
Tear drops like rain seldom ever end,
Wait, for the bliss is calling!
Spring comes calling dear Darling,
Happiness blooms along and the fragrance clinging,
For love we share unending,
A melancholy drop of water,
In arms of thunder is born anew,
Dreaming to green the greener.
Sunday, 9 October 2016
तो फिर तू क्यूँ उदास है
तू सशक्त है समर्थ है, तो फिर तू क्यूँ उदास है,
तू गिर ज़रा संभल ज़रा, क्यूँ हो रहा हताश है,
तू रक्त है विरक्त है, तुझी से वक़्त की आस है,
तू जलज है समुद्र तू, बुझा दे जो भी प्यास है,
जो समझे ना तेरी कदर, छेड़ दे तू इक ग़दर,
ये विश्व तेरा सर्वस्व है, अकेला तू फिरे किधर,
पाषाण जो हो राह में, ना पथ पृथक तू करना ,
आँधियों की गति से डर के, ना तू चाह छोड़ना,
हो दूर ग़र अरुण किरण, उसकी राह तू ताकना,
जो तन से तू थके अग़र, ना मन से कभी तू हारना ।
Monday, 30 November 2015
चूड़ियाँ
मैंने लोगो को कहते सुना है, हाथों में चूड़ियाँ पहन लो | इसका अर्थ है कि आपमें साहस कि कमी है और चूडि़यां पहनने वाले हाथ कमजोर है | किन्तु मैं इससे सहमत नहीं | एक भिन्न दृष्टिकोण से चूड़ियों पर उल्लेख-
बजती
हैं माँ कि चूड़ियाँ,
रसोई
में मेरे लिए स्वादिष्ट भोजन पकाने के लिए,
मंदिर
की घंटी बजा कर मेरे लिए दुआ का हाथ उठाने के लिए |
बजती
है माँ कि चूड़ियाँ,
मुझे
थपकी दे कर सुलाने के लिए,
मुझ
पर आशीष बरसाने के लिए |
बजती
रहे ममता भरी ये चूड़ियाँ ||
बजती
है बहन कि चूड़ियाँ,
मुझे
सता कर अपने पीछे दौड़ाने के लिए,
मुझ
से मीठी नोक-झोंक में कमर पर हाथ रख धौंस जमाने के लिए |
बजती
है बहन कि चूड़ियाँ,
मेरे
माथे पर चंदन का टीका लगाने के लिए,
मेरे
हाथों में राखी सजाने के लिए |
बजती
रहे शरारत भरी ये चूड़ियाँ ||
बजती
है पत्नी कि चूड़ियाँ,
प्रतीक्षारत
हाथो से दरवाज़ा खोलने के लिए,
मुझे
आलिंगनबद्ध कर मनुहार जताने के लिए |
बजती
है पत्नी कि चूड़ियाँ,
मेरी
पसंद के पकवान बनाने के लिए,
मेरे
घर आँगन को सँवारने के लिए |
बजती
रहे प्रेम भरी ये चूड़ियाँ ||
बजती
है बेटी कि चूड़ियाँ,
मेरे
घर को अपनी किलकारियों से सजाने के लिए,
नन्हे
हाथों से गुड्डे गुड़ियों संग खेलने के लिए |
बजती
है बेटी कि चूड़ियाँ,
ससुराल
जाते हुए छुप कर आँसू पोंछेने के लिए,
दौड़ते
हुए मेरे सीने से लग जाने के लिए |
बजती
रहे मासूमियत भरी ये चूड़ियाँ ||
Sunday, 9 August 2015
Happy Ending?
All my life I craved for an Happy Ending,
As I grew old I would always wait for what is never ending,
Golden moments passed by which were very rare,
It was me who gave them hardly any care,
Now I wonder if I could get those moments all over again,
I've decided never to mourn in any pain,
The true wisdom dawned upon me sooner or later,
It's not the end, but the whole story that is dear.
Sunday, 7 June 2015
दर्जन भर कॉपियां
याद आया आज स्कूल वाला जून जुलाई का महीना,
ख़त्म होती थी जब गर्मी की छुट्टियां,
पापा के साथ लाते दर्जन भर कॉपियां,
लाते बड़े नाप की नयी नवेली यूनिफॉर्म |
नया बस्ता नयी बोतल,
कॉपियों के पसंदीदा लेबल,
चार रंगों वाला पेन और अप्सरा की पेंसिल,
बारिश में स्कूल जाने कि होती चहल पहल |
सौंधी सी नयी क़िताबो की महक,
दोस्तों से मिलने की अभिलाषा की चहक,
छुट्टियों के किस्सों वाली बातों की खनक,
नयी क्लास में साल बिताने की ललक |
स्कूल बस में साथियों का शोर,
सुबह असेंबली में प्रार्थना कि कतार,
करते हर रोज़ रविवार का इंतज़ार,
देखते दूरदर्शन पर तरंग और चित्रहार ||
-----------------
-----------------
अब होता है हर महीना एक समान,
ना किताबें ना उनके लेबल,
बस कीबोर्ड पर दौड़ती उंगलियां और ऑफ़िस की टेबल,
बस कीबोर्ड पर दौड़ती उंगलियां और ऑफ़िस की टेबल,
ना बजती छुट्टी की घंटियाँ |
ना भोर कि ख़बर ना डूबते सूरज पर नज़र,
अब कब होती है सहर और ढलता है दिन किस पहर,
ना ख़ुशनुमा मौसम, ना त्यौहार सा रविवार,
ना यूनिट टेस्ट का भार, ना टीचर की डांट का शिकार ||
Monday, 6 April 2015
Sunday, 29 March 2015
ना सोचा है
किस ओर चलूं ना सोचा है,
किस ठोर थमु ना सोचा है,
चलते रहूँ या राह चुनूं,
मंज़िल कि तलाश करूँ,
या खड़ी रहूँ चौराहों पे,
किस ओर बढ़ूँ ना सोचा है |
आसमां को भर लूँ मुट्ठी में,
या छोड़ दूँ खुली हाथ कि लकीरों को,
ज़िद करूँ क्या लड़ने कि,
क्या हाल चुनूं ना सोचा है |
दिल तोड़ चलूँ या मन जोड़ चलूँ,
रुख मोड़ चलूँ या जग छोड़ चलूँ,
दो कदम चलूँ या दौड़ चलूँ,
या ख्वाब चुनूं ना सोचा है ||
Monday, 19 January 2015
I am..
They call me elegant, they call me pretty,
They call me canny, they call me witty,
I tell I do not fit that fashion model's size,
They say I am telling lies,
The curve of my waist and the bulk of my hips,
The charm on my cheek and the towing gravity of my eyes,
This is all that appeals the world's fancies,
I am exceptionally a woman, or merely a woman.
I walk into the room, just as cool as you please,
I have the tolerance to bear the obnoxious blames,
I have the valor to invade their reins,
I have the valor to invade their reins,
I have my stand, and I seldom bend,
I never weep in the solitude, unlike the trend,
My power is exceptional, that's how I am rational,
I am exceptionally a woman, or merely a woman.
Saturday, 3 January 2015
Thursday, 1 January 2015
Saturday, 27 December 2014
Sunday, 23 November 2014
The Sound of the Silence
The sound of the silence,
Falling as a shattered glass on the floor,
Into the loneliness of the empty hall,
Prickling on every step like sharp nails under the foot,
The sound of the silence,
Crept like a venomous snake's mighty crawl,
Echoed into a bundle of silent rolls,
Collapsed amongst self like adamant snow balls.
















