ना ताला टूटा ना दरवाज़ा खुला फिर भी कोई उसे मुझसे चुरा ले गया,
हाँ कोई मेरे मासूम सा बेटा मुझसे चुरा ले गया,
चोर और कोई नहीं “वक़्त” था,
झगड़ा मेरा उस वक्त से है,
अपने बेटे के जल्दी बड़े हो जाने के हक़ से है,
पहले जब उसे गोद में लेती तो दूध और पाउडर की महक आती,
अब महक आती है तो बस पसीने और धूल मिट्टी की,
रोज़ रात को सोता है,
सुबह देखती हूँ तो लगता है थोड़ा और बड़ा हो गया है,
वक़्त की ये जेबकतरी मुझे राज़ नहीं आती,
पर मैं उसके आगे जीत नहीं पाती,
शुरुवात घुटनों के रगड़ने से हुई,
फिर आया उँगली पकड़ कर डगमाना,
फिर ठुमक ठुमक कर चले लड़खड़ाते हुए नन्हे कदम,
अब वह कूदने लगा है, फुदकने लगा है,
मुझसे भी तेज भागने लगा है,
पहले मेरे एक फूंक से उसकी चोट ठीक हो जाया करती,
मेरा जादू अब कमजोर हो रहा है,
हाथों से आँखों को ढँकने वाली लुका छिपी अब नहीं होती,
स्मार्ट वॉच की कॉलिंग से ढूँढना आसान जो हो रहा है,
अब किलकारियाँ या तुतलाती आवाज़ नहीं है,
बस तर्क वितर्क का सिलसिला होता हैं,
घर में खिलौनों की जगह किताबों ने ले ली है,
घर अब म्यूज़्यूम कहाँ है, ये तो लाइब्रेरी बन गया है,
मेरी गोद अब छोटी हो गई है,
और उसका आलिंगन बड़ा हो गया है,
अब उसकी दुनिया बड़ी होती जा रही है,
और मेरी, उसमे सिमटती जा रही है,
फ़ोन हमेशा हाथ में और कैमरा ऑन रहता है,
यादें capture कर लू ये एहसास रहता है,
कल जब उसकी ये मासूमियत दूर हो जाएगी,
वो घड़ी देख कर कहेगा “Mumma, I am busy”
तो ये फोटो और वीडियो ही मुस्कुराहट लायेंगी,
बच्चे नदी की तरह होते है,
उनका काम है बहते रहना,
हर नदी का सागर में मिलना निश्चित है,
उसे ना हम रोक सकते है ना धीमा कर सकते है,
बस नदी के किनारे बैठ उसमें अपने पैर डूबा सकते है,
उसकी ठंडी हवाओं का लुत्फ़ लेते हुए उसे निहार सकते है,
वक़्त की ये जेबकतरी मुझे राज़ नहीं आती है,
पर उसके आगे जीत नहीं पाती,
उसके बड़े होने की ख़ुशी और ग़म एक साथ मनाती,
इस चोरी का साक्षात्कार खुली आँखों से करती जाती!

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