यहाँ हर व्यक्ति का जीवन, हर व्यक्ति के बिना चल जायेगा ,
मगर तुम्हारा तुम्हारे बिना, कभी नहीं चल पायेगा ।
भरोसा न हो तो जग की, हाँ में हाँ मिला कर देख लो,
अपनी खुशियों को तज कर, औरों को रिझा कर देख लो।
मसरूफ़ हैं सब अपनी धुन में, कोई और न दर्द ये बांटेगा,
तेरी आँखों में जो थकान छुपी, इसे तू खुद ही तो काटेगा।
स्वयं का ध्यान रखना जीवन में, ये कोई स्वार्थ नहीं,
जो निज अस्तित्व का मान न रख सके, उसका यहाँ कोई काम नहीं।
जब तक भीतर स्वास्थ्य की गंगा, तब तक दुनिया की सौ जंग हैं,
एक बार जो स्वास्थ्य डगमगाए, मिट जाते सब रंग हैं।
फिर, सौ दुखों की जगह जगत में, बस एक ही दुख रह जाता है,
परिवार, रिश्तेदार, मित्र रहें सेवा में तत्पर, कष्ट न कोई बांट सकेगा,
इस काया की सूनी पीड़ा, बस तू अकेला ही काटेगा।
तुम्हारी सच्ची संपत्ति सिर्फ तुम और तुम्हारी यह काया है,
जो जीवन भर साथ निभाए, बस वह केवल यह काया है,
अस्वस्थ तन-मन हो जिसका क्या उसे कभी कुछ भाया है ।
स्वस्थ देह और सजग चेतना, मानव का सच्चा श्रृंगार है,
शारीरिक ऊर्जा और व्यायाम ही है जो तुम्हें रखता जीवन भर तैयार है।
तन को गढ़ना सुंदर कर्म है, पर मन को भी विश्राम देना,
मन विकारों से मुक्त रहे, इस आत्मिक धन को सहेज लेना।
जीवन के पहले सावन से ही, कुछ क्षण अपने हित बचाए रखना,
काया सुंदर और स्वस्थ रहे, बस इतना ध्यान सदा रखना,
अतः स्वयं से रूठ कर तुम, इस जीवन को यूँ मौन न करना,
जब तक साँसें शेष हैं भीतर, अपने हिस्से का सावन जीवित रखना।



