कल शाम सूखे हुए फूलों को देख कर ख्याल आया,
सुख जाने से वो “कम” फूल नहीं हो जाते,
उनकी स्थिरता उनकी नई खूबी बन जाती है,
उनकी मर्ज़ी के बिना उन्हें हिला पाये,
किसी ऐरे ग़ैरे हवा के झोंखे में उस गुस्ताख़ी की ताक़त ना रह जाती है,
दुनिया दौड़ रही है, मैं थोड़ा धीरे चलने लगी हूँ,
थकी नहीं हूँ बस थोड़ा charge हो रही हूँ,
ख़ुद से अब थोड़ा ज़्यादा मिलने लगी हूँ,
ख़ुद का ध्यान अब ज़्यादा रखने लगी हूँ,
शब्दों को स्याही में डुबा कर दवात में घोलने लगी हूँ,
शायरी भी मेरी और शायर भी मैं ही बनने लगी हूँ,
अगर कुछ लिखूँगी ही तो ख़ुद पर लिखूँगी,
कुछ शोर अपने और कुछ सन्नाटे लिखूँगी,
संवरने लगी हूँ अपने मुताबिक़ मैं,
हो रहीं हूँ जो ख़ुद से वाक़िफ़ मैं,
पसंद आ रहा है मुझे ख़ुद का ये बदलना,
अपनी बनायी राह पर बेबाक़ चलना,
चार लोग है कुछ तो कहेंगे,
ना कहेंगे तो क्या करेंगे,
अपने कानों का इस्तेमाल अब कम करने लगी हूँ,
ख़ुद की खामोशी की फुसफुसाहट में मदहोश रहने लगी हूँ,
ख़ुद पे शक अब और नहीं करने लगी हूँ,
धूल चेहरे पर हो या आईने पर,
मोहब्बत ख़ुद के हर अक्स से करने लगी हूँ,
मुझे मैं अब अच्छी लगने लगी हूँ।

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