Wednesday, 31 January 2018

मोबाइल


झुके रहते है सर आजकल हर पल,
लगता है सबका ख़ुदा बदल गया है,

हाथ जोड़े है हर कोई शान से,
प्रार्थना का ये नया ज़रिया निकल गया है,

बातें अब होती कहाँ है आपस में जनाब,
कमरे में हर व्यक्ति चैटिंग से बहल गया है,

मिल आये दुनिया से ऑनलाइन अभी अभी,
अपनों से मिलने का वक़्त बंट गया है,

गिल्ली डंडा खेलना ना जाने ये पीढ़ी,
बचपन अब सेल्फी स्टिक में जो अटक गया है,

कागज़ की कश्ती कहाँ तैरती अब बरसात में,
मोबाइल पर उंगलियां दौड़ाने में जो मन भटक गया है |

(Disclaimer: This post does not intend to harm, defame, or hurt the sentiments of any person, gender, religion, political party, news channel, religious belief, god or to whomsoever it may concern. I sincerely apologize in advance if it is so.)

2 comments: